Thursday, 13 December 2018

Do not believe in politics (राजनीती पर भरोसा मत करो)


14-12-2018


आज कल के चुनावी माहौल को देखते हुए मेरे मैं मन एक विचार आया है ! हर एक प्रत्याशी का अपने चाहने वालो का उससे स्नेह रखने वालो का एक कारवां है, एक अपनी भीड़ है ! उस भीड़ में कुछ चेहरे नो तो चाहने की भी हद्द पार कर रखी है ! अपने अपने प्रत्याशी को भगवान बनाने में लगे हुए है ! और खुद उनके भक्त, दास, गुलाम !!
हज़ारो बरसो की गुलामी को, जो अब रक्त बन के शरीर की रगो में बह रही है, यूँ भुला देना संभव नहीं है ! कही कही उस गुलामी का असर अवचेतन मन के हिस्से में बैठा हुआ है ! पहले मुगलो की, राजा महाराजाओ की फिर अंग्रेजो की और अब राज नेताओ की ! गुलामी को हमने शायद अपने शरीर का ही एक हिस्सा मान लिया है !
हर एक व्यक्ति अपने अपने उम्मीदवार को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने में और सामने वाले को पूरी तरफ से गलत, चोर और लुटेरा घोषित करने में  जी जान से जुटा हुआ है ! उस राजनेता को सपोर्ट कर रहा है जिस पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता ! जिस राजनेता पर भरोसा किया जा सके फिर वो राजनेता ना हुआ ! गाँधी की बातो पर लोगो ने जल्दी भरोसा इसलिए किया क्यों की गाँधी राजनितिक आदमी नहीं था, नैतिक आदमी है ! और नैतिक आदमी का सहारा ले कर राजनितिक आदमी अपना काम निकाल लेता है ! उसे अपना उल्लू सीधा करना है ! नेहरू ने भी यही किया , गाँधी के नाम का सहारा लेकर राजनीती में अपना मुकाम बनाया और आज़ाद भारत का प्रधानमंत्री बना ! और विगत वर्षो में अन्ना हज़ारे जैसे नैतिक आदमी का इस्तेमाल करके केजरीवाल मुख्यमंत्री बना !!
राजनेता पर भरोसा कर ले ऐसा कोई राजनेता शायद ही दुनिया में हो !
मेने सुना है की कल्लूराम एक राजनेता हुआ करता था ! राजनीती की दुनिया में उससे बेहतर शायद ही कोई और नेता हुआ हो ! साम दाम दंड भेद का बड़ा ज्ञाता था ! बरसो बरस से राजनीती कर रहा था ! उसको हरा पाना जल्दी संभव ना था ! हर वक़्त उसी माहौल में रंगा रहता ! उसका बेटा लल्लूराम भी उसको देख देख के बड़ा हुआ था और अपने पिता की तरह ही बड़ा राजनेता बनना चाहता था ! वो अपने पिता को बात करते हुए देखता , जनता से मिलते हुए देखता ! अपनी पार्टी और दूसरी पार्टी के लोगो से मिलते हुए देखता ! चलने का ढंग और बात करने के तरीके को सिखने की और उन्हें दोहराने का अभ्यास किया करता !
एक दिन लल्लूराम ने अपने पिता कल्लूराम से हिम्मत बाँध  के कहा की पिताजी मुझे भी राजनीती में आना है ! मुझे भी आपसे राजीनीति के दांव पेच सिखने है !
पिता कल्लूराम ने बेटे की बात को गंभीरता से लिया और कुछ सोचने के बाद अपने दोमंजिला माकन की छत पर ले गया ! और अपने बेटे से कहा की इस छत से कूद जाओ !!
बेटे ने निचे झाँक के देखा तो घबरा गया क्यों की वो काफी ऊंचाई पर खड़ा था ! और वह से निचे कूदने का मतलब यह था की अगर मरा भी नहीं तो हड्डी पसली जरूर टूट जाएगी ! उसने कूदने से मन कर दिया और कहा की आप क्या कहते हो ? अगर मैं यहाँ से कूदा तो मुझे चोट लग सकती है ! पिता ने कहा की तू नाहक फ़िक्र कर रहा है ! जब मैं तेरे साथ खड़ा हूँ तो चिंता करने की कोई बात नहीं है ! तू कूद जा ! और अपने ऊपर यकीन कर मैं तुझे कुछ नहीं होने दूंगा ! भरोसा रख कुछ नहीं होगा !
लल्लूराम पिता की बात पर यकीन करके मकान की छत से कूद गया और निचे गिरते ही बहुत चोटिल हो गया ! घुटने चटख गए हाथ की कोहली बुरी तरह से छील गयी ! ठोड़ी टूट गयी और नाक से खून बहने लगा ! उसने गुस्से में अपने पिता से कहा की कैसे पिता है आप ? अपनी औलाद के भी दुश्मन हो ! आप पर भरोसा करके कूदा था और आपने मुझे बचाने आने की बजाय कदम पीछे की तरफ खिंच लिए ! लानत है आप पर, मुझे आपसे कोई राजनीती नहीं सीखनी और अब तो मुझे आपसे बात भी नहीं करनी है, मेहरबानी करके आप यहाँ से चले जाए !!
पिता कल्लूराम को बेटे को लगी चोट का कोई दुख ना था, चेहरे पर लेस नाम सिकन नहीं थी ! अपने पिता को गंभीर मुद्रा में देख बेटे ने पिता से कुछ कहना  चाहा ! वो कुछ पूछ पता पिता कल्लूराम बोला की बेटे आज राजीनीति सिखने का पहला दिन है और पहले दिन की पहली सीख यह है कीराजनीती में कभी अपने बाप पर भी भरोसा मत करो !!”
राजीनीति का पहला सबक ही यही है की किसी का भरोसा मत करो ! तुम लोग जिनका गुणगान कर रहे हो, समय आने पर वो तुम्हारा साथ भी छोड़ देंगे ! इस राजनेताओ के चक्कर में अपना आपस का भाईचारा समाप्त ना करो ! आपकी विप्पति में आपका मित्र या पडोसी काम आएगा ये राजनेता नहीं ! सोशल मीडिया में लिखना हो या कही किसी के सामने ! शब्दों को चयन सोच समझ कर करना ! राजनेता तो साल रहेगा उसके बाद पता नहीं रहेगा या नहीं ! लेकिन आपका मित्र, आपका समंधी आपका पडोसी सदा आपके साथ रहेगा !
किसी को सपोर्ट करने में समस्या नहीं है लेकिन किसी के अंध भक्त बन जाना, उनके मानसिक गुलाम बन जाने में हानि है ! अतः अपने संबंघो में कोई खटास ना आने दे !! धन्यवाद् आपका !

मुकेश सोनी

Monday, 10 December 2018

अति आत्मविश्वास से मत भरो (Do not be over confident)


राजस्थान में एक घुमक्कड़ समुदाय होता है,  लोहार ! लोहार समुदाय का विवरण महाराणा प्रताप के समय काल से भी मिलता है ! महाराणा जब अकबर से युद्ध हार कर जंगल की तरफ चले गए थे और जंगली भोजन पर जीवन व्यतीत कर रहे थे ! उस समय उन्हें समर्थन देने और उनकी तरफ से लड़ने का वायदा करने वाली अग्रिम श्रेणी में लोहार जाती का विशेष नाम आता है !
महाराणा के समय काल से ही वो जाति अपना जीवन महाराणा की लड़ाई को समर्पित करते हुए उन्ही की तरह घुमक्कड़ जीवन जीने की प्रतिज्ञा ली ! आधुनिक काल में तो बहुत सारे अब घर बना के रहने लग गए है ! खेती बाड़ी भी करने लग गए है ! लेकिन कुछ ऐसे परिवार भी है जो अपने पूर्वजो के वचनो का पालन करते हुए घुमक्कड़ जीवन व्यतीत  कर रहे है !
मैंने एक कहानी सुनी है !
गाड़िया लोहार का घर एक बैल गाड़ी पर होता है ! लकड़ी के चाक पर निर्मित लकड़ी की गाडी होती है ! जिस पर उनकी रोज मर्रा का सामान , खाने का सामान और कपड़े होते है ! लोहे के औजार होते है ! उनकी उस गाडी को एक या दो बैल खींच रहे होते है ! पीछे एक कुत्ता बंधा होता है ! कुत्ते के पीछे बंधे होने का कोई ख़ास तर्क नहीं होता ! शायद इसलिए की एक जानवर पाला जा सकता है, उसे बचा खुचा खाना दिया जा सके ! कुत्ता भी अपना कार्य पूरी कुशलता से करने की कोशीश करता ! चाहे वो लोहार के बच्चो के साथ खेलना हो या किसी अजनबी को देखकर भोकना ! 
गाड़िया लोहार परिवार एक गाँव से दूसरे गाँव और फिर दूसरे से तीसरे !!
कुछ दिनों बाद कुत्ते को ये भरम हो गया की इस गाड़ी का बोझ मैंने अपने कंधे पर ले रखा है ! वो बात बात पर बैलो के ऊपर भोकना शुरू कर देता ! आये दिन बैलो पर चिल्लाता की तुम दोनों निकम्मे हो, नालायक हो ! फ्री का खाना खा खा के तुम्हारे शरीर पर मोती चर्बी गयी है, इस गाडी का बोझ मुझे ढोना पड़  रहा है ! अगर मैं इस गाड़ी की पीछे नहीं होता तो तुम लोग पता नहीं कैसे इसका बोझ उठा पाते ! आये दिन इस लोहार की गाडी को ज़मीन पर गिराते रहते !!
बैल भी मस्त मौजी रहे होंगे की कुत्ते की बात को सुन के भी अनसुनी कर देते और अपनी मौज में चलते रहते ! उनकी तरफ से कोई भी जवाब ना पा कर कुत्ता बड़ा खुश होता और मन ही मन सोचता की मैंने कैसे इन्हे व्यवस्थित कर रखा है ! अगर मैं इनका पथ सञ्चालन ना करू तो ये पता नहीं कब इस गाडी को पलट दें !
एक दिन भयानक गर्मी का वक़्त था ! गर्मी के मारे दोनों बैलो का बुरा हाल था ! दोनों पसीने पसीने हो रखे थे ! की ऊपर से ये कुत्ता बार बार उनकी जान खाये जा रहा था ! बार बार उनकी नाक में डैम कर रहा था ! कह रहा था की दोनों निकम्मे हो , काम चोर और नालायक हो ! अगर मैं इस गाडी के पीछे नहीं बंधा होता तो पता नहीं तुम इस गाडी का क्या हाल करते ! मुझे ही इस गाडी का बोझ उठाना पड़ रहा है !
कुत्ते की रोज रोज की इस बक बक से दोनों बैल अब उकता चुके थे ऊब चुके थे ! रोज रोज वही बकवास सुनना  ! आये दिन ताने सुनना  ! गर्मी के मारे वैसे ही दोनों का हाल बेहाल था की दोनों की नज़र एक दूसरे से मिली और आँखों ही आँखों में इशारा हुआ ! इससे पहले की कुत्ता कुछ समझ पता, दोनों बैल एक साथ अचानक से ज़मीन पर बैठ गए ! अब गाडी का पूरा भार कुत्ते की पीठ पर गिरा !
कुत्ते की आँखे बाहर आने को गयी और जीभ बाहर निकल  आयी ! पूरी गाड़ी का भार उसपर कुछ ऐसा गिरा की उसकी समझ में कुछ नहीं आया, बस यह था की यह बजह हटे तो कुछ बात बने ! उसकी साँसे बंद होने को ही थी , आत्मा परमात्मा को मिलने वाली ही थी की बैल अचानक से खड़े हो गए !
बैल जब खड़े हुए और कुत्ते की कमर से वो बोझ उठा तो उसकी जान में जान आयी !
कुछ देर बाद जब उसे होश आया और उसे यह एहसास हुआ की सबकी जगह अपने आप में महत्वपूर्ण है ! परमात्मा ने सबको अपने अपने कार्य में दक्ष किया है, भोकने और काटना मेरा काम हो सकता है लेकिन मैं बोझा उठाने और गाडी खींचने के लिए नहीं बना ! उसके लिए यह बैल ही है !
उसने दोनों बैलो से माफ़ी मांगी और कहा की मैं अनजाने में ही इस गाडी का भार अपने कंधे पर लिए घूम रहा था ! अनजाने भरम को दूर करने के लिए आपका धन्यवाद् !!
बैलो ने भी उसको माफ़ कर दिया !

अति आत्मविश्वास से मत भरो ! हर कोई अपने काम में दक्ष है ! तुम फालतू कुत्ते बन के गाडी का भार अपने कंधे पर मत लो ! दूसरे के कार्य के भार को स्वयं का भार समझने वाले इंसान की हालत इस कुत्ते से ज्यादा नहीं है ! जिस दिन उस पर बोझ पड़ेगा उसे बोध हो जायेगा !
ठोकर खा के सिखने से बेहतर है की इस कहानी से कुछ सीखे !

जय गुरु गोरखनाथ !!

मुकेश सोनी